बारिश, दही, और मिर्च की वह पहली तीखी चुभन
#कटक में मैंने पहली बार दहीबरा आलूदम सही मायने में मानसून की बारिश के दौरान खाया था। मैं एक नीली प्लास्टिक की चादर के नीचे खड़ा था, जो बीच में बार-बार ऐसे धंस रही थी जैसे उसने जिंदगी से हार मान ली हो। एक कोने से पानी टपक रहा था, गीली सड़क पर स्कूटर सरसराते हुए निकल रहे थे, और ठेलेवाला ऐसे फुर्ती से काम कर रहा था जैसे वही जादू का करतब वह दस हज़ार बार कर चुका हो। एक स्टील की देगची से बड़ा, दूसरी से दही, फिर उस पर लाल-भूरी ग्रेवी वाला आलूदम चम्मच से डाला गया, घुगुनी को ऐसे समेटकर रखा गया जैसे वह हमेशा से वहीं की हो, और फिर ऊपर से छिड़काव का पूरा मामला: मसाला, कटा हुआ प्याज़, सेव, धनिया, शायद थोड़ा काला नमक भी। मैंने एक कौर लिया और सच कहूँ तो मैं लगभग भूल ही गया कि मेरे जूते भीग चुके थे।¶
कटक आपके साथ ऐसा ही करता है। यह ऐसा शहर नहीं है जो पर्यटकों के लिए चमकदार बनने की कोशिश करे। यह पुराना, भीड़भाड़ वाला, व्यावहारिक है, ऐसी गलियों से भरा है जो मानो एक-दूसरे में मुड़ती-समाती चली जाती हैं, और फिर अचानक आपको एक खाने का ठेला मिल जाता है जो आपको समझा देता है कि लोग दहीबरा आलूदम के बारे में इतनी निष्ठा से क्यों बात करते हैं। सिर्फ स्नेह नहीं। निष्ठा। जैसे अगर आप कह दें कि यह “बस दही वड़ा और आलू की करी” है, तो कोई आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने उनके बड़े चाचा का अपमान कर दिया हो।¶
और मानसून इसे और भी नाटकीय बना देता है। हवा ठंडी हो जाती है, धूल बैठ जाती है, और तले हुए खाने, गीली मिट्टी, मंदिर के फूलों, पेट्रोल और दही की गंध सब मिलकर कटक के बिल्कुल खास अंदाज़ में एक हो जाती हैं। लेकिन मानसून सड़क के खाने को थोड़ा पेचीदा भी बना देता है। मुझे बारिश में खाने-पीने की यात्राओं का रोमांस सच में बहुत पसंद है, सचमुच, लेकिन रास्ते में पेट खराब होने के इतने अनुभव भी हो चुके हैं कि अब मैं जानती हूँ कि सिर्फ रोमांस कोई पाचन-रणनीति नहीं है। इसलिए यह कटक के दहीबरा आलूदम को बारिश में बिना अपनी यात्रा खराब किए खाने के लिए मेरी बहुत पक्षपाती, बहुत भूखी, लेकिन थोड़ी-सी सावधान मार्गदर्शिका है।¶
कटक का दहीबड़ा आलूदम कहीं और से अलग क्यों लगता है
#अगर आप इससे नए हैं, तो दहीबरा आलूदम नरम दाल के बड़ा होते हैं जो दही में भिगोए जाते हैं, ऊपर से मसालेदार आलू करी, अक्सर घुगुनी, और अंत में मसाले तथा कुरकुरेपन की परत डाली जाती है। ओडिशा में दहीबरा की अपनी अलग पहचान है, और कटक में आलूदम के साथ इसका मेल लगभग दंतकथा जैसा माना जाता है। लोग इसे सुबह खाते हैं, नाश्ते के रूप में, मन को तसल्ली देने वाले भोजन की तरह, बहस के विषय के रूप में, और शहर पार जाने की वजह के रूप में भी। मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। मैंने एक बार दो आदमियों को दस मिनट तक इस बात पर बहस करते देखा कि किस ठेले पर दही की खटास और आलू की तीखापन का संतुलन बेहतर था, और उस समय उनमें से कोई भी वास्तव में खा नहीं रहा था।¶
कटक वाला संस्करण, कम-से-कम वे जिन्हें मैंने पसंद किया है, एक पागल-सा संतुलन रखता है। दही ठंडा होता है, लेकिन मिठाई जैसा मीठा नहीं। बड़ा नरम होता है, पर इतना भी नहीं कि बिल्कुल ढीला-पिचका लगे। आलूदम इतना मसालेदार होता है कि दिमाग को जगा दे, लेकिन दही उसे फिर संभाल लेता है। फिर घुगुनी अपने मिट्टीले, पीली मटर वाले सुकून के साथ आती है। यह कोई फैंसी सजावट नहीं है। यह उससे बेहतर है। यह ऐसा हंगामा है जो खुद को जानता है।¶
मैंने दहीबड़ा आलूदम व्यस्त सड़क किनारों के पास, बाजार इलाकों के आसपास, और बाराबती किला तथा महानदी किनारे जैसे पुराने कटक के स्थलों के पास घूमने के बाद खाया है। मैं यह दिखावा नहीं करूँगा कि हर प्लेट बेहतरीन थी। कुछ बहुत पानीदार थीं, एक में बड़ा ऐसा लगा जैसे वह मेरे स्कूल के दिनों से इंतज़ार कर रहा हो, और एक बार मसाले का स्तर इतना ज़्यादा था कि मैंने चुपचाप पानी की एक बोतल खरीदी और ऐसा जताया कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। लेकिन अच्छी प्लेटें? वे दिमाग में बस जाती हैं।¶
कटक में मेरी बरसात वाले दिन की फूड वॉक, थोड़ी भीगी हुई लेकिन बहुत खुश
#मैं एक धूसर सुबह भुवनेश्वर से कटक पहुँचा था—वैसी सुबह, जब आसमान ऐसा लगता है मानो बारिश के बारे में सोच रहा हो, लेकिन पहले थोड़ा रोमांच बनाना चाहता हो। शहर में दाखिल होने वाली सड़क पर मानसून की चमक थी, और लोग पहले से ही अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लगे हुए थे, जैसे बारिश बस पृष्ठभूमि में बजता कोई संगीत हो। मैंने एक साधारण लॉज में चेक-इन किया, अपना बैग नीचे रखा, और डेस्क पर बैठे आदमी से पूछा कि पास में दहीबड़ा आलूदम कहाँ अच्छा मिलता है। उसने स्थानीय अंदाज़ वाला वही क्लासिक जवाब दिया: एक नहीं, तीन विकल्प, और साथ में यह चेतावनी भी कि “यह वाला अच्छा है, लेकिन भीड़ खत्म कर दे उससे पहले पहुँच जाना।”¶
अगर आप इसके बारे में सोचें, तो वह वाक्य वास्तव में पूरी सुरक्षा सीख ही है। जब भीड़ हो तब जाओ, जब खाना चल रहा हो तब जाओ, और चीज़ें बहुत देर तक पड़ी रहें उससे पहले जाओ। मैंने उसका दूसरा सुझाव माना क्योंकि वहाँ पैदल जाया जा सकता था, और इसलिए भी क्योंकि उसने कहा था कि वहाँ का आलूदम “असली” है, जो सुनने में गंभीर लगा। ठेले के आसपास पहले से ही दफ़्तर जाने वाले लोग, छात्र, छाते पकड़े आंटियाँ, स्कूटर पर दो पैकेट संतुलित करता एक आदमी, और मैं—जो अनजान न दिखने का नाटक कर रहा था—घिरे हुए थे।¶
विक्रेता ने जल्दी परोसा। कोई बेवजह का नाटक नहीं। उसने प्लेट रखने की जगह को पानी से धोया, बरा को चम्मच से उठाया, नंगे हाथों से नहीं, और दही का बर्तन ज़्यादातर ढका हुआ था, बस परोसते समय ही खोला गया। मैंने यह सब इसलिए नोटिस किया क्योंकि अब मैं वैसा यात्री बन गया हूँ। मेरा कम उम्र वाला रूप तो बस वह सब खा लेता जो अच्छी खुशबू देता। अभी वाला मैं भी वह सब खा लेता हूँ जो अच्छी खुशबू देता है, लेकिन पहले छोटी-छोटी बातों के संकेत देख लेता हूँ। शायद यही परिपक्वता है।¶
मानसून में स्ट्रीट फूड खाने का मतलब डरना नहीं है। इसका मतलब है सतर्क रहना। बहुत बड़ा फर्क है।
मानसून की समस्या: डेयरी, पानी, और भोजन जो बहुत देर तक इंतज़ार करता है
#ईमानदारी से कहें तो, दहीबरा आलूदम में कुछ ऐसी सामग्री होती हैं जिनके साथ बरसात के मौसम में सावधानी बरतनी पड़ती है। दही डेयरी है। बड़ा भिगोया हुआ होता है। चटनियों और मसालों में पानी का इस्तेमाल हो सकता है। प्याज़ और धनिया ताज़ा टॉपिंग होते हैं। इसमें नमी, सड़कों पर छींटे, अपनी ही दोपहर का खाना ढूंढ़ती मक्खियाँ, और कभी-कभी बिजली कटौती भी जोड़ दें, तो समझ में आ जाता है कि आपको सोच-समझकर चुनने की ज़रूरत क्यों है। घबराना नहीं है, बस समझदारी से चुनना है।¶
भारतीय सार्वजनिक-स्वास्थ्य और खाद्य-सुरक्षा स्रोतों से मिलने वाली खाद्य-सुरक्षा सलाह उतनी ही उबाऊ लगती है जितनी सीटबेल्ट की सलाह: साफ पानी, साफ हाथ, ढका हुआ खाना, ताज़ा बना हुआ भोजन, डेयरी उत्पादों का सुरक्षित भंडारण, और संदूषण से बचाव। बहुत बुनियादी। बहुत आसान है इसे नज़रअंदाज़ कर देना जब आपका पेट ज़ोर-ज़ोर से मांग कर रहा हो। लेकिन मानसून में यही बुनियादी बातें और भी ज़्यादा मायने रखती हैं। खासकर दही-आधारित खाद्य पदार्थों के साथ। अगर दही से तेज़ खट्टी बदबू आ रही हो, वह सामान्य से अधिक फटा हुआ और पानी-पानी दिखे, या वह बिना ढके रखा हो जबकि सड़क से बारिश की फुहार उसमें पड़ रही हो, तो मुझे फर्क नहीं पड़ता कि वह ठेला कितना मशहूर है, मैं वहाँ से चला जाऊँगा।¶
मैंने एक बात सीखी है कि प्रतिष्ठा मदद करती है, लेकिन सही समय उससे भी ज़्यादा मदद करता है। बंद होने के समय का एक मशहूर ठेला, जहाँ थके हुए बचे-खुचे खाने पड़े हों, उससे ज़्यादा जोखिमभरा हो सकता है बनिस्बत चरम समय पर एक साधारण ठेले के, जहाँ खेप पर खेप तेजी से निकल रही हो। मुझे पता है यह सुनने में रोमांटिक नहीं लगता, लेकिन यात्रा के दौरान पेट सिर्फ रोमांस पर नहीं चलता। अगर आप दूसरे शहरों में भी मानसून के दौरान सड़क किनारे के ठेलों के विकल्पों की तुलना कर रहे हैं, तो यही तर्क गाइड्स में भी दिखता है, जैसे चेन्नई मरीना बीच स्नैक्स इन मॉनसून: सुंडल, भज्जी और सुरक्षा, खासकर जोखिमभरे पानी, गीले काउंटरों और बहुत देर से रखे हुए खाने से बचने के बारे में।¶
जब बारिश हो रही हो तो मैं दहीबरा आलूदम का ठेला कैसे चुनता हूँ
#मेरे पास एक छोटी-सी चेकलिस्ट है, लेकिन क्लिपबोर्ड वाली नहीं। ज़्यादा ऐसे जैसे मैं फोन देखने का नाटक करते हुए जल्दी से नज़र दौड़ा लूँ। सबसे पहले, मैं भीड़ को देखता हूँ। क्या वहाँ स्थानीय लोग लगातार खा रहे हैं, या खाना बस टबों में पड़ा है? दूसरी बात, मैं देखता हूँ कि दही ढकी हुई है या नहीं। तीसरी बात, मैं देखता हूँ कि ठेला कहाँ लगा है। अगर वह परोसने वाली जगह में बहती हुई नाली के ठीक बगल में है, तो माफ़ कीजिए, नहीं। मुझे रोमांच पसंद है, लेकिन उस तरह का नहीं।¶
- मुझे वे स्टॉल पसंद हैं जहाँ विक्रेता जल्दी परोसता है और खाना बार-बार ताज़ा भरता रहता है, न कि वे जगहें जहाँ वही पुराना बैच थका-सा दिखता रहे।
- भारी बारिश के दौरान मैं कटे हुए फल, खुले रखी चटनियाँ और पानी जैसी अतिरिक्त चीज़ों से बचता हूँ। दहीबड़ा आलूदम के साथ मैं आमतौर पर ऐसी किसी भी चीज़ को छोड़ देता हूँ जो पतली या पानी मिली हुई लगे।
- मैं अपनी पानी की बोतल खुद साथ रखता/रखती हूँ। यह कोई ग्लैमरस बात नहीं है, लेकिन इसने कई बार मेरी मदद की है।
- मैं यह देखता/देखती हूँ कि प्लेटें और चम्मच साफ-सफाई से संभाले जाते हैं या नहीं। एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लेटें अपने-आप में अधिक सुरक्षित नहीं होतीं, खासकर अगर उन्हें किसी गीले, धूल-भरे कोने में रखा गया हो।
- मैं उन ठेलों/स्टॉलों से नहीं खाता जहाँ बारिश का पानी सीधे खाने के ऊपर टपक रहा हो। यह बात सुनने में साफ़-साफ़ और obvious लगती है, फिर भी आपको हैरानी होगी कि जब खुशबू अच्छी हो तो लोग इसे कितनी बार नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
साथ ही, कृपया अपनी नाक पर भरोसा करें। आपकी नाक बहुत कुछ जानती है। ताज़ा दही की खुशबू हल्की खट्टी और सुखद होती है। पुरानी दही से पछतावे जैसी गंध आती है। ताज़े आलूदम की महक गरम, मसालेदार, भुनी हुई और जीवंत होती है। पुराना आलूदम फीका, तैलीय, या अजीब तरह से खट्टा महक सकता है। शायद यह नाटकीय लगे, लेकिन मैंने सिर्फ एक बार सूंघकर ही पूरी प्लेट छोड़ दी है, और मुझे इस बात पर बिल्कुल शर्म नहीं है।¶
सुबह आमतौर पर आपकी दोस्त होती है
#कटक में, मैं दहीबरा आलूदम दिन की शुरुआत में खाना पसंद करता हूँ, खासकर मानसून में। सुबह और देर सुबह बहुत अच्छे समय होते हैं क्योंकि खाना अक्सर ताज़ा तैयार होता है, भीड़ भी सक्रिय रहती है, और आलूदम की गर्माहट भी ठीक रहती है। दोपहर तक, ठेले पर निर्भर करते हुए, चीजें शायद काफी देर से रखी हों, दोबारा गरम की गई हों, ऊपर से बार-बार डाली गई हों, और कुल मिलाकर बहुत ज़्यादा बार इस्तेमाल हो चुकी हों।¶
यह भारत के अन्य शहरों की फूड वॉक जैसी ही बात है, जहाँ जल्दी जाने से बहुत फर्क पड़ता है। उदाहरण के लिए, अमृतसर में सुबह का कुलचा और लस्सी तब सबसे अच्छे लगते हैं जब दुकानें व्यस्त हों और डेयरी ताज़ी हो, इसलिए मुझे इसमें दी गई व्यावहारिक सोच पसंद आई अमृतसर मॉर्निंग फूड वॉक सुरक्षा: कुलचा और लस्सी टिप्स। कटक अमृतसर नहीं है, जाहिर है, लेकिन यह नियम वहाँ भी अच्छी तरह लागू होता है: जल्दी जाएँ, भीड़ वाली जगह जाएँ, ताज़ा खाएँ।¶
उस यात्रा में मेरी पसंदीदा कटक की प्लेट सुबह लगभग 9:30 बजे मिली थी। बारिश थम चुकी थी, सड़कें अब भी गीली थीं, और ठेला पूरे रंग में चल रहा था। बड़ा ठंडा और स्पंजी था, लिसलिसा नहीं। आलूदम में वह धीमी-धीमी तीखापन था जो दही के आपको शांत करने के बाद महसूस होता है। दुकानदार ने ऐसा मसाला डाला जो गले के पीछे तक असर करता था, फिर थोड़ा-सा कुरकुरापन, और मुझे याद है मैंने सोचा था—इसीलिए लोग खाने के लिए रास्ता बदलते हैं। स्मारकों के लिए नहीं। तस्वीरों के लिए नहीं। एक कागज़ की प्लेट के लिए, जिसकी कीमत कम होती है, लेकिन जो आपको पाँच कौर में पूरा शहर दे देती है।¶
प्लेटों के बीच कहाँ भटकें, क्योंकि कटक सिर्फ़ नाश्ते के लिए रुकने की जगह नहीं है
#बहुत से लोग कटक को भुवनेश्वर और किसी दूसरी जगह के बीच बस जल्दी से खाना खाने के ठहराव की तरह देखते हैं, और यह गलती है। मेरा मतलब है, अगर आपके पास सिर्फ दहीबरा आलूदम के लिए ही समय है, तो ठीक है, मैं आपको ज़्यादा जज नहीं करूंगा। लेकिन इस शहर की कई परतें हैं। बाराबती किला ऐसा माहौल देता है कि अगर आप इतिहास के बहुत बड़े शौकीन भी नहीं हैं, तब भी यह असर छोड़ता है। बारिश के मौसम में महानदी के आसपास का इलाका खुला-खुला और थोड़ा भावपूर्ण-सा महसूस होता है। कटक चंडी मंदिर में रोज़मर्रा की भक्ति वाली जो ऊर्जा है, वह मुझे यात्रा के दौरान हमेशा सुकून देने वाली लगती है। और पुरानी गलियां, जिनमें चांदी की फिलिग्री की दुकानें, मिठाई की दुकानें, दवा की दुकानें, साइकिल मरम्मत वाले, और नाश्ते के ठेले हैं, सच कहूं तो अनुभव का आधा हिस्सा वही हैं।¶
कटक में मानसून के दौरान पैदल चलना बड़ा झंझटभरा होता है। फुटपाथ गायब हो जाते हैं, ट्रैफिक की छींटें पड़ती रहती हैं, और आपका छाता शायद गलती से किसी को हमला कर दे। ऐसी सैंडल या जूते पहनिए जो गंदे पानी को झेल सकें। अपने प्यारे सफेद स्नीकर्स मत पहनिए, जब तक कि आपको उदासी पसंद न हो। मैं आमतौर पर अपने बैग में एक छोटा तौलिया रखती हूँ, साथ में सैनिटाइज़र, टिश्यू और अपने फोन के लिए एक प्लास्टिक पाउच भी। बिल्कुल आंटी-कोर वाइब है, लेकिन काम की चीज़ है।¶
एक प्लेट खाने के बाद, मैं पुराने बाज़ार वाली तरफ़ चल पड़ा और बस शहर को अपने-आप घटित होने दिया। वहाँ फेरीवाले ऐसी चीज़ें तल रहे थे जिनके नाम मैं नहीं जानता था, चाय की दुकानें छोटे इंजनों की तरह भाप छोड़ रही थीं, और सब्ज़ी बेचने वालों के पास गीले जूट के बोरों की गंध फैली हुई थी। एक समय, छाते बेचने वाले एक आदमी ने मुझे दूसरा छाता बेचने की कोशिश की, जबकि मेरे हाथ में पहले से ही एक छाता था। “यह वाला बेहतर है,” उसने कहा। सच कहूँ तो, शायद वह सही था।¶
अगर आपका पेट संवेदनशील है, तो कुछ साबित करने की कोशिश न करें
#फूड ट्रैवल का एक अजीब-सा माचो पहलू होता है, जहाँ लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे बीमार पड़ जाना इस बात का सबूत हो कि आप सच में रोमांचकारी थे। नहीं, धन्यवाद। मुझे रोमांच भी चाहिए और एक ठीक से काम करने वाली पाचन-प्रणाली भी। अगर आप भारतीय स्ट्रीट फूड के आदी नहीं हैं, या अभी-अभी लंबी यात्रा के बाद पहुँचे हैं, तो धीरे-धीरे शुरू करें। किसी भरोसेमंद, भीड़भाड़ वाले ठेले से एक ही प्लेट लेकर शुरुआत करें। उसी दोपहर में दहीबरा आलूदम के साथ पाँच और तीखे नाश्ते, सड़क किनारे कटा हुआ फल, कहीं से भी लिया गया गन्ने का रस, और अज्ञात पानी के तीन कप—सब कुछ एक साथ मत खाइए-पीजिए। मैं ऐसा अलग-अलग रूपों में कर चुका हूँ। इससे कोई चरित्र-निर्माण नहीं हुआ था।¶
बच्चों, बुज़ुर्ग यात्रियों, या जिनका पेट संवेदनशील है, उनके लिए मैं मानसून में डेयरी और मसाले की मात्रा को लेकर खास सावधानी बरतने की सलाह दूँगा। कम मसाला डालने के लिए कहें, अगर भरोसा न हो तो कच्चा प्याज़ छोड़ दें, और अगर खाने का स्वाद खराब लगे तो उसे छोड़ने में झिझकें नहीं। अगर आप बच्चों के साथ यात्रा कर रहे हैं या विदेश से आ रहे परिवार के साथ हैं, तो मानसून में भारतीय स्ट्रीट फ़ूड आज़माते एनआरआई बच्चे: सुरक्षा गाइड में दी गई रफ़्तार संबंधी सलाह कटक पर भी काफ़ी लागू होती है, खासकर पहले हफ़्ते में शरीर को ढलने देने वाली बात और पहले ही दिन पूरा स्ट्रीट-फ़ूड योद्धा न बन जाने वाली सलाह।¶
- उत्साह में आकर लगातार तीन ठेलों पर खाने की बजाय, पहले किसी एक अच्छे ठेले पर खाएँ।
- सीलबंद बोतलबंद पानी पिएँ या ऐसा पानी पिएँ जिसके बारे में आप जानते हों कि वह फ़िल्टर किया गया है और सुरक्षित है।
- मानसून के दौरान यात्रा करते समय अपने बैग में ORS के सैशे रखें। उम्मीद है कि उनकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, लेकिन उनका वज़न लगभग कुछ भी नहीं होता।
- अगर दही का स्वाद फिज़ी, अजीब तरह से कड़वा, या बहुत ज़्यादा खट्टा लगे, तो रुक जाएँ। डेयरी से बहस मत कीजिए।
विक्रेता से क्या पूछें, बिना खाने के निरीक्षक जैसे लगे
#मैं बहुत ज़्यादा सवाल पूछने में झिझकता/झिझकती हूँ क्योंकि मैं किसी के काम का अपमान नहीं करना चाहता/चाहती। लेकिन आप साधारण, सामान्य बातें पूछ सकते हैं। “भाई, ताज़ा है ना?” बहुत-सी जगहों पर काम करता है। या “दही ठंडी है?” अगर आप यह देख रहे हैं कि दही ठंडी है या नहीं। कभी-कभी मैं पूछता/पूछती हूँ कि उन्होंने परोसना किस समय शुरू किया। जब सामान ताज़ा होता है तो विक्रेताओं को आमतौर पर उस पर गर्व होता है। और अगर वे चिढ़े हुए लगें, तो मैं उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेता/लेती। वे व्यस्त हैं, बारिश परेशान करती है, ग्राहक अधीर होते हैं, ज़िंदगी चल रही होती है।¶
मैं यह भी देखता हूँ कि वे प्लेट कैसे तैयार करते हैं। अगर वही हाथ पैसे ले रहा है, बारिश का पानी पोंछ रहा है, नंगे बरा उठा रहा है, और ऊपर से डालने वाली चीज़ों को छू रहा है, तो यह आदर्श नहीं है। कई छोटे विक्रेता लोगों की अपेक्षा से बेहतर स्वच्छता बनाए रखते हैं, लेकिन आपको ध्यान से देखना पड़ता है। कटक में मेरे सबसे अच्छे अनुभवों में, विक्रेता की एक साफ़ लय थी: पैसे अलग से संभाले जाते थे या जल्दी से हाथ पोंछ लिए जाते थे, परोसने के लिए चम्मचों का इस्तेमाल होता था, भीड़ के बीच बर्तनों को ढककर रखा जाता था, और आलूदम गरम रखा जाता था। गरम करी कोई जादुई ढाल नहीं है, लेकिन जब खाना ताज़ा पकाया गया हो और तेजी से परोसा जा रहा हो, तो यह मदद करती है।¶
जब मैंने कम मिर्च माँगी तो एक दुकानदार हँस पड़ा। उसने कहा, “टूरिस्ट?” मैंने कहा, “डर वाला खाने का शौकीन।” उसने मुझे मध्यम-मसाले वाली प्लेट दी और फिर भी उसमें अतिरिक्त मसाला डाल दिया, क्योंकि जाहिर है मेरी राय मायने नहीं रखती थी। वह बहुत स्वादिष्ट था। मुझे थोड़ी तकलीफ़ हुई। इसके लायक था, लेकिन बस थोड़ी ही।¶
दहीबरा आलूदम से परे बारिश के मौसम की लालसाएँ
#कटक आपको सिर्फ एक व्यंजन पर रुकने नहीं देगा। अगर मौसम ठंडा हो, तो चाय अनिवार्य हो जाती है। वैकल्पिक नहीं। मैंने भीड़भाड़ वाले चौराहे के पास छोटे मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पी, जो इतनी मीठी थी कि उसे मिठाई कहा जा सकता था, और उसने बारिश को लगभग पहले से तय-सी महसूस कराया। यहाँ बड़ा, पियाजी, गुपचुप, चाट, मिठाइयाँ, और हर तरह की तली-भुनी चीज़ें भी हैं, जो मानसून की यात्रा को सबसे अच्छे तरीके से खतरनाक बना देती हैं। फिर भी, मैं कोशिश करता हूँ कि एक ही बार बाहर निकलने में बहुत ज़्यादा डेयरी और तली-भुनी चीज़ें न खाऊँ। मैं यह ऐसे कहता हूँ जैसे मैं बहुत अनुशासित हूँ। मैं हमेशा अनुशासित नहीं रहता।¶
एक शाम, लंबी और नम-सी सैर के बाद, मेरा मन दहीबरा आलूदम की एक और प्लेट खाने का हुआ, लेकिन जो ठेला मुझे पसंद था वह बंद होने वाला था और दही का बर्तन भी लगभग खाली लग रहा था। पहले वाला मैं सोचता, अरे छोड़ो, बस खा लो। नया मैं उसकी जगह गरम चाय ले आया और दूसरी प्लेट अगली सुबह के लिए छोड़ दी। उस छोटे-से फैसले ने शायद मेरी रात बचा ली। या शायद उससे कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन यात्रा ऐसी ही छोटी-छोटी पुकारों से भरी होती है, और मानसून में आप थोड़ा ज़्यादा धैर्य रखना सीख जाते हैं।¶
एक सरल मानसून सुरक्षा तालिका जिसका मैं वास्तव में उपयोग करता हूँ
#| मैं क्या जाँचता हूँ | अच्छा संकेत | चेतावनी संकेत |
|---|---|---|
| दही | ढका हुआ, ठंडा, ताज़ी खटास | खुला हुआ, पानी जैसा, तेज़ खराब गंध |
| आलूदम | गरम, गाढ़ा, अक्सर दोबारा भरा जाता है | हल्का गुनगुना, ऊपर तेल की परत, बहुत देर से रखा हुआ |
| ठेले का स्थान | भीड़-भाड़ वाली जगह, अपेक्षाकृत सूखा काउंटर, खाना सुरक्षित ढका हुआ | नाली का ओवरफ्लो, बर्तनों के पास बारिश का पानी टपकना |
| विक्रेता की कार्यप्रणाली | तेज़ बिक्री, चम्मचों का इस्तेमाल, अपेक्षाकृत साफ-सुथरी व्यवस्था | पैसे और खाने को लगातार साथ-साथ संभालना |
| आपका अपना शरीर | भूख लगी है लेकिन ठीक हैं, शरीर में पानी की कमी नहीं है | थके हुए, पेट पहले से खराब, ज़्यादा गर्मी लगी हुई |
यह तालिका सड़क के खाने को क्लिनिकल महसूस कराने के लिए नहीं है। कृपया वहाँ आवर्धक शीशा लिए किसी जासूस की तरह खड़े मत रहिए। बस एक नज़र डालिए। आप तीस सेकंड में बहुत कुछ समझ सकते हैं। और अगर दो या तीन चेतावनी संकेत एक साथ दिखें, तो आगे बढ़ जाइए। कटक में अच्छे खाने की बहुत-सी प्लेटें मिलती हैं। किसी संदिग्ध ठेले को छोड़ देने से आप शहर के साथ कोई बेवफाई नहीं कर रहे हैं।¶
मेरी बहुत ही व्यक्तिगत राय में, परफेक्ट मानसूनी थाली को क्या खास बनाता है
#मेरे लिए, परफेक्ट प्लेट की शुरुआत ऐसे बड़ा से होती है जिसमें अभी भी थोड़ा ठोसपन बना रहे। उसे दही सोखना चाहिए, लेकिन गीले पेस्ट की तरह बिखर नहीं जाना चाहिए। दही मुलायम, हल्का खट्टा और आलूदम के मुकाबले ठंडा होना चाहिए। आलूदम में गहराई होनी चाहिए, सिर्फ मिर्च नहीं। मुझे मसाला चाहिए, हाँ, लेकिन उसके साथ आलू की वह धीमी मिठास और भुने मसाले वाला स्वाद भी। घुगुनी नरम होनी चाहिए, लेकिन पानीदार नहीं। अगर प्याज डाली जाए, तो वह ताज़ी होनी चाहिए। ऊपर से डाला गया अंतिम मसाला ऐसा होना चाहिए कि आपकी जीभ एकदम जाग उठे। और पूरी चीज़ तुरंत वहीं खड़े-खड़े खानी चाहिए, जबकि बारिश फिर से शुरू होने की धमकी दे रही हो।¶
कुछ लोगों को यह ज़्यादा तीखा पसंद है। कुछ लोगों को ज़्यादा दही पसंद है। कुछ लोग आलू से ज़्यादा घुगुनी चाहते हैं। मैं संतुलन पसंद करने वाला इंसान हूँ, जो सुनने में परिपक्व लगता है, लेकिन असल में इसका मतलब है कि मुझे एक साथ सब कुछ चाहिए। कटक के दहीबरा आलूदम की खुशी यही है कि हर ठेले की अपनी अलग पहचान होती है। किसी में दही का स्वाद ज़्यादा उभरकर आता है, किसी में आलू ज़्यादा होता है, और किसी का मसाला ऐसा होता है कि वह पारिवारिक झगड़े सुलझा भी सकता है या शुरू भी कर सकता है। दो-तीन सुबहों में कुछ अलग-अलग जगहों पर चखना, शहर में बीस मिनट बिताकर किसी एक को “सबसे अच्छा” घोषित करने से कहीं ज़्यादा मज़ेदार है।¶
कटक के लिए मेरी आख़िरी बरसाती सलाह, एक भूखे यात्री की ओर से दूसरे के लिए
#भूख के साथ जाइए, घमंड के साथ नहीं। कटक का दहीबरा आलूदम इतनी दूर जाकर खाने लायक है, खासकर मानसून में, जब मौसम हर गर्म-तीखे-ठंडे कौर को उससे भी ज्यादा खास बना देता है। लेकिन उत्साह में अपनी समझदारी बंद मत कर दीजिए। किसी व्यस्त ठेले को चुनिए। थोड़ा जल्दी खाइए। दही पर ध्यान दीजिए। जिस पानी पर भरोसा न हो, उससे बचिए। पहले ही दिन पेट पर ज़्यादा बोझ मत डालिए। सैनिटाइज़र, टिश्यू और अपना पानी साथ रखिए। ऐसे जूते पहनिए जो गड्ढों और पानी भरी सड़कों को झेल सकें। और कृपया, खाते समय किसी सुरक्षित जगह पर खड़े रहिए, क्योंकि कटक का ट्रैफिक इस बात की परवाह नहीं करता कि आप ज़िंदगी बदल देने वाले स्नैक का पल जी रहे हैं।¶
उस यात्रा से मुझे सबसे ज़्यादा जो याद है, वह सिर्फ़ स्वाद नहीं है, हालाँकि स्वाद लाजवाब था। मुझे याद है प्लास्टिक की चादरों पर टपकती बारिश, ठेलेवाले के तेज़ हाथ, मेरे बगल वाले आदमी का ऐसे अतिरिक्त आलूदम माँगना जैसे वह उसका कानूनी हक़ हो, धूसर रोशनी में चमकती गीली सड़कें, और मेरा यह सोचना कि कुछ शहर अपना परिचय स्मारकों के ज़रिए देते हैं, लेकिन कटक यह काम दही में भीगे बड़ा और मसालेदार आलू की एक प्लेट के ज़रिए करता है। अगर आप जाएँ, तो जमकर खाइए, थोड़ा सावधान रहिए, और सुबह के लिए एक प्लेट और की जगह छोड़िए। और अगर आपको खाने-पीने और यात्राओं की ये थोड़ी बिखरी-बिखरी कहानियाँ पसंद आती हैं, तो कभी AllBlogs.in पर भी नज़र डालिए, यह भूखे यात्रियों के लिए एक बढ़िया-सी rabbit hole है।¶














